अफग़ानिस्तान में तालिबान के सत्ता में लौटने के साथ ही महिलाओं
पर अत्याचारों की पुरानी तस्वीरें भी स्मृतियों में लौट आई हैं।
बीते कुछ दशकों में अफ़गानिस्तान की छवि एक कट्टरपंथी राष्ट्र के रूप
में रही है। लेकिन यह हमेशा से ही ऐसा नहीं रहा । वहां एक समय ऐसा भी
था, जब महिलाओं को पुरुषों के समान लगभग पूरी आजादी थी।
1960 का स्वर्णिम दशक : जब महिलाओं को थी भरपूर आज़ादी
1920 के दशक में अफगानिस्तान में सुल्तान अमानुल्ला
खान और रानी सोराया के शासनकाल में जो सुधारबादी
कदम उठाए गए थे, वे 1960 के दशक में फिर से नई
आभा लिए दिखाई देने लगे। इस काल को अफगानिस्तान
का स्वर्णिम काल माना जाता है। दरअसल, 1950
के दशक में अमेरिका ने अफगानिस्तान में बुनियादी
सुविधाओं पर खर्च करना शुरू किया जो 1960 के अंत
तक 16.50 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया था। यह आज के
अरबों डॉलर के बराबर था। अमेरिका की अफगानिस्तान
में बढ़ती रुचि को देखते हुए तत्कालीन सोवियत संघ ने
भी वहां निवेश शुरू किया। कुछ ही सालों में सोवियत संघ
का यह निवेश एक अरब डॉलर तक पहुंच गया। 1963
में मोहम्मद दाऊद खान ने सत्ता संभाली जो विचारों से
प्रगतिशील थे। प्रगतिशील सरकार में इन दोनों महाशक्तियों
के निवेश का सकारात्मक असर पड़ा। काबुल और अन्य
शहरों में आधुनिक भवन तैयार किए गए। उच्च शिक्षा के
कई संस्थान शुरू किए गए जिनमें महिलाओं को भी समान
अवसर दिए गए। इस समय भी अफगानिस्तान में उदार
रूप में मुस्लिम कानून जारी थे, लेकिन महिलाओं के साथ
कोई जोर-जबरदस्ती नहीं थी। कॉलेजों में लड़कियां बगैर
बुरके के जाती थीं इसी दौरान अफगानिस्तान में विदेशी
पर्यटन भी बढ़ा जिसके फलस्वरूप और भी संमृद्धि आई।
विदेशी महिला पर्यटकों को देखकर अफगानी महिलाओं ने
भी उन्हीं की तरह का पहनावा शुरू किया जिस पर किसी
को कोई ऐतराज नहीं था।
महाशक्तियों के दख़ल और तेज सुधारों से बना विरोध का माहौल
1978 में कम्युनिस्ट विचारधारा वाली पीपुल्स
डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ अफगानिस्तान (पीडीपीएफ) ने
उस समय के मौजूदा शासक मोहम्मद दाऊद खान का
तख्ता पलट दिया। मोहम्मद दाऊद हालांकि तानाशाह
थे, लेकिन विचारों से प्रगतिशील भी थे कम्युनिस्ट
विचारधारा वाली पीडीपीएफ ने सत्ता में आते ही बड़ी
तेजी से सुधार कार्यक्रम शुरू कर दिए। मुस्लिम कानून
पूरी तरह से बदल दिए गए। इससे पाकिस्तान समर्थक
मुजाहिदीनों ने पीडीपीएफ सरकार के खिलाफ हथियार
उठा लिए। सोवियत समर्थित सरकार को अस्थिर करने
के लिए अमेरिका ने भी पाकिस्तान के जरिए मुजाहिदिनों
को फंडिंग और हथियारों की आपूर्ति शुरू कर दी। इससे
अफगानिस्तान गृहयुद्ध में फंसता चला गया। थोड़ी बहुत
प्रगतिशीलता भी इस गृहयुद्ध में तबाह हो गई।
तालिबान : महिला अधिकार ख़त्म, अब फिर लौटा वही दौर
तालिबान की स्थापना पाकिस्तान में प्रशिक्षित मुल्ला
मोहम्मद उमर ने सितंबर 1994 में की थी। वह इस बात
से नाराज था कि 1992 में कम्युनिस्ट समर्थक नजीब
सरकार के पतन के बाद भी अफगानिस्तान में मुस्लिम
कानून पूर्णता में लागू क्थों नहीं किए गए। एक ही माह
में तालिबान से करीब 15 हजार छात्र जुड़ गए। अंततः
पाकिस्तान की मदद से तालिबान ने 27 सितंबर 1996
को काबुल पर कब्जा कर किया। 2001 तक तालिबान का
शासन रहा। इस दौरान महिलाओं को तमाम अधिकारों से
वोचित कर दिया गया। 2001 से 20 साल तक अमेरिका
की छत्रसाया में उदार सरकारों ने सत्ता संभाली। महिलाओं
के कई अधिकार बहाल हुए। हालांकि तालिबान का खौफ
बना रहा। अब अमेरिका सैनिकों की वापसी के बाद फिर
से तालिबान का वही नृशंस दौर लौटता नजर आ रहा है।
काश, अमेरिका ज्यादा अफ़गानी महिलाओं को सैन्य प्रशिक्षण देता...
विदेश मामलों के विशेषज्ञ और अफगानिस्तान के इतिहास पर करीबी
नजर रखने वाले डॉ रहीस सिंह बताते हैं कि बीते 20 सालों में
अमेरिका ने करीब 3 लाख अफगान जवानों को सैन्य प्रशिक्षण दिया।
लेकिन तालिबान के हालिया हमलों के सामने इन सभी ने घुटने टेक
दिए हैं। अगर अमेरिका इन तीन लाख में से आधी संख्या में यानी
करीब डेढ़ लाख महिलाओं को भी सैन्य प्रशिक्षण दे देता तो आज
हालात कुछ अलग हो सकते थे। क्योकि तालिबान की वापसी को
महिला अस्मिता और अधिकारों से जोड़कर देखा जा रहा है इसलिए
ये महिला सैनिक तालिबान के सामने आसानी से हार नहीं मानतीं।
प्रतिष्ठित मैगजीन 'टाइम के दो कवर बता रहे हैं कि कसे अफानिस्तान में महिलाओं की स्थिति मुआाहिदीन
और तालियान के आने के बाद बदतर होती मई...👩
रानी सोराया ने बुरका उतारकर फाड़ दिया था
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| image source: bbc india |
टाइम मैगजीन के कवर पर साल 1927 में अफगानिस्तान की रानी सोराया ताजीं
की तस्वीर प्रकाशित हुई थी। आज कोई इस बात पर यकीन नहीं करेगा कि अफगानिस्तान में
ऐसी भी रानी हो चुकी है जिसने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में अपने बुरके को निकालकर फाड़
डाला था। रानी सोराया अफगानिस्तान का वह उदार चेहरा है, जिसने देश में महिलाओं के लिए
प्रगति के रास्ते खोले। साल 1913 में सोराया का अफगानिस्तान के प्रिंस अमानुल्ला खान से
निकाह हुआ था। अफगानिस्तान में प्रक्रिया साल 1919 में अमानुल्ला खान के आमिर
बनने से शुरू हुई। सोराया अपने पति के साथ हर सार्वजनिक कार्यक्रम में भाग लेतीं, यहां तक कि
अक्सर कैबिनेट की बैठकों में भी शामिल होतीं। काबुल में लड़कियों के लिए पहला प्राइमरी स्कूल
सोराया ने ही 1920 में शुरू करवाया था। उन्होंने शाही खर्चे पर 1928 में अफगानिस्तान की 15
युवा महिलाओं को उच्च शिक्षा के लिए तुर्की भी भेजा। अमानुल्ला व सोराया अफगानिस्तान को
प्रगतिशील बनाने की राह पर आगे बढ़ा रहे थे कि 1929 में वहां गृहयुद्ध छिड़ गया। उन्हें परिवार
सहित अफगानिस्तान से पलायन करना पड़ा। वे रोम में बस गए। 20 अप्रैल 1968 को सोराया ने
वहीं अंतिम सांस ली।
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