Consumer Protection Act/Amendment 2019(Part-2)


झूठी शिकायत पर आपको भी मिल सकती है सजा

 

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जिला, राज्य या राष्ट्रीय आयोगों के आदेशों का पालन नहीं करने वाले को एक से तीन महीने

का कारावास हो सकता है। उस पर 25 हजार रुपए जुर्माना भी लगाया जा सकता है, जिसे एक

लाख रुपए तक बढ़ाया जा सकता है।

  कंज्यूमर एक्ट तथा कंज्यूमर फोरम ग्राहक के हित की रक्षा करने के लिए बनाए गए

हैं। अगर ग्राहक के साथ किसी प्रकार की धोखाधड़ी होती है तो बिना डरे उपभोक्ता कोर्ट

या फोरम का रुख करना चाहिए। नुकसान के सभी तथ्यों, सबूतों को शिकायत करने से

पूर्व एक फाइल में व्यवस्थित लगाएं। ऑफ लाइन शिकायत कर रहें हैं तो उपभोक्ता फोरम

कार्यालय से फॉर्म की फीस भरकर शिकायत को प्रोसेस करें और ऑनलाइन शिकायत के

लिए नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन की वेबसाइट पर लॉगऑन करें। लेकिन उसके पहले यह

भी सुनिश्चित करना चाहिए कि कहीं आप गलत तो नहीं हैं? किसी भी व्यापारी, विक्रेता

या कंपनी पर गलत आरोप लगाकर शिकायत करना गैर कानूनी है, अपराध है। ऐसा करने

पर ग्राहक को भी जुर्माना और सजा हो सकती है। जिसके खिलाफ आपने शिकायत की है,

वह उल्टा आप पर हर्जाना ठोंक सकता है। ऐसे में आप मुसीबत में पड़ जाएंगे, इसलिए

झूठी शिकायत करने से बचें। शिकायत दर्ज होने पर फोरम स्वतः मामले की सुनवाई शुरू

कर देगा।

मामला क्या है, कितनी राशि का है, इसके हिसाब से शिकायत करने की जगह तथा

मापदंड तय किए जाते हैं। जैसे कि- 

डिस्ट्रिक्ट कंज्यूमर फोरम : अगर शिकायत 20 लाख की रकम तक की है तो डिस्ट्रिक्ट

कंज्यूमर फोरम के पास शिकायत करें।

स्टेट कंज्यूमर फोर : मामला 20 लाख से 1 करोड़ की रकम तक का है, तो स्टेट कंज्यूमर

फोरम को शिकायत करें।

नेशनल कंज्यूमर फोरम : 1 करोड़ की रकम से ऊपर का मामला है तो नेशनल कंज्यूमर

फोरम के पास शिकायत करनी होगी।

 

जबरन वसूली-धोखाधड़ी: ऐसे मामलों

में उपभोक्ता फोरम के शिकायत केंद्र

(1800114000) पर सुबह 9:30 से शाम

5.30 बजे तक शिकायत कर सकते हैं।

टोल-फ्री नबरः इस नंबर 18001800300

पर मैखिक शिकायत दर्ज करें।

एसएमएस: 8130009809 पर करें।

ऑनलाइन: core.nic.in पर शिकायत दर्ज

करा सकते हैं।

 

अपना केस लड़ने के लिए आप ही वकील होते है 

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 फोरम 21 दिन में तय कर लेता है कि आपका केस लेने लायक है या नहीं। फिर संबंधित संस्थान से स्पष्टीकरण मांगने के साथ ही ग्राहक को 90 दिन में न्याय दिलाने की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है।

 

किसी वस्तु का उपभोग करने वाला व्यक्ति यानी उपभोक्ता परेशान न हो,

उसे जल्द न्याय मिले, इसके लिए ही ऐसे फोरम की स्थापना की गई है।

उपभोक्ता फोरम अर्द्ध-न्यायिक निकाय होते हैं, जो सरल तरीके से और त्वरित

न्याय प्रदान करते हैं। इन फोरम को सिविल न्यायालय की जटिल न्यायिक

प्रक्रियाओं से मुक्त रखा गया है। अतः, इनमें वकील अथवा किसी अन्य तर्क

देने वाले व्यक्ति की कोई आवश्यकता नहीं होती है। उपभोक्ता ही मामला

दायर करता है, वही अपनी शिकायत सबूतों के साथ पेश करता है और वही

स्वयं का प्रतिनिधि होता है। यदि आप यह सब करने में खुद को असमर्थ

पाते हैं तो ही वकील की मदद लें। इस भाग में हम कुछ जरूरी प्रश्नों के

उत्तर दे रहे हैं-


 

आमतौर पर पूछे जाने वाले प्रश्नों के उतर 

* बस, रेल, विमान सेवा संबंधी शिकायत भी कर सकते हैं क्या?

- हां, ये सभी सेवा में कमी के मामले बनते हैं। बगैर सूचना बस निरस्त करना, ज्यादा

किराया वसूलना, ट्रेन लेट की सूचना न देना या गलत देने से आपकी कोई हानि होना। 

इसी तरह फ्लाइट के मामले में भी शिकायत कर सकते हैं।

* शिकायत कब दर्ज कराई जा सकती है? दो वर्ष के भीतर। इसका मतलब है कि जिस

दिन वस्तुओं में दोष आया या पाया गया, उस समय से दो वर्ष की अवधि में।

* किस राज्य अथवा शहर में दर्ज होगी? -आप जहां रहते हैं, वहां के फोरम में दर्ज

कराएं। आपने सामान कहीं से भी खरीदा हो, शिकायत आपके अपने होम टाउन में दर्ज करा

सकते हैं। पुराने कानून में ऐसी व्यवस्था नहीं थी।

* कौन उपभोक्ता नहीं कहलाएगा? - वह व्यक्ति जो मुफ्त में वस्तुएं प्राप्त करता

है। उपहार लेता है। जो मुफ्त सेवाएं लेता है। जो वस्तुएं बेचता है। जो किसी व्यावसायिक

उपयोग के लिए किसी से दान में वस्तु प्राप्त करता है, ये उपभोक्ता नहीं कहलाएंगे।

* सभी फोरम कहां हैं, राष्ट्रीय आयोग का पता क्या है? -जिला मंच प्रत्येक जिले में होता है। राज्य

आयोग हर राज्य की राजधानी में तथा राष्ट्रीय आयोग नई दिल्ली में स्थित है। नई दिल्ली का

पता : उपभोक्ता न्याय भवन, एफ. ब्लॉक,

जी.पी.ओ. कॉम्पलेक्स, आई.एन.ए., नई

दिल्ली 1100231 अधिक जानकारी के

लिए वेबसाइट:- http://ncdrc.nic.in पर क्लिक करें।


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Consumer Act.(Part-1)


वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के जरिये भी होगी आपकी     सुनवाई . . . 

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      आज ग्राहकों के साथ जमाखोरी, मिलावट, बिना मानक की वस्तुओं की बिक्री,अधिक दाम, गारंटी बाद भी सर्विस न देना, ठगी जैसे मामले होते हैं। इन सब से निपटनेके लिए ही यह कानून बनाया गया है।

उपभोक्ता वह व्यक्ति है जो अपने इस्तेमाल

के लिए कोई वस्तु खरीदता है या सेवा प्राप्त

करता है। इसमें वह व्यक्ति शामिल नहीं है जो

किसी वस्तु को दोबारा बेचने के लिए उसे

हासिल करता है। इसमें ईशॉपिंग, टेलीशॉपिंग,

मल्टी लेवल मार्केटिंग या सीधे खरीद के जरिये

किया जाने वाला सभी तरह का ऑफलाइन

या ऑनलाइन लेन-देन शामिल है। इसलिए

उपभोक्ता के हितों की रक्षा करने के लिए

सरकार ने उपभोक्ता संरक्षण कानून यानी

कंज्यूमर एक्ट बनाया है। जनता के हितों की

अनदेखी न हो, इसलिए सरकारी नियंत्रण वाली

संस्था उपभोक्ता फोरम में आपकी शिकायत

पर निष्पक्ष होकर फैसले देती है। हाल में तीन

दशक पुराने उपभोक्ता संरक्षण कानून, 1986

को बदल दिया गया है। इसकी जगह उपभोक्ता

संरक्षण कानून, 2019 ने ली है। नए कानून

में उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते

हुए पुराने नियमों की खामियां दूर की गई हैं।

नए कानून की कुछ खूबियों में सेंट्रल रेगुलेटर

का गठन, भ्रामक विज्ञापनों पर भारी पेनल्टी,

ई-कॉमर्स फर्मों और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस

बेचने वाली कंपनियों के लिए सख्त दिशानिर्देश

तथा कार्रवाई करना शामिल हैं।

देश में कहीं भी करें शिकायतः नए कानून

में एक और बड़ा बदलाव यह है कि उपभोक्ता

अब कहीं से भी शिकायत दर्ज कर सकता है।

पहले वहीं शिकायत दर्ज करा सकते थे, जहां

से वस्तु खरीदी है। इसके अलावा कानून में

उपभोक्ता को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये भी

सुनवाई में शिरकत करने की इजाजत है। इससे

उपभोक्ता का पैसा और समय दोनों बचेंगे।


उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के अधिकार

* ऐसी वस्तुओं और सेवाओं की मार्केटिंग के

खिलाफ सुरक्षा प्रदान करना जो जीवन और

संपत्ति के लिए खतरनाक हैं।

* गुणवत्ता, मात्रा, शक्ति, शुद्धता, मानक और

उत्पादों या सेवाओं के मूल्य के बारे में सूचित

करने का अधिकार। ताकि व्यापार के अनुचित

तरीकों के खिलाफ आपकी रक्षा हो सके।

* जहां संभव हो, आश्वस्त होने का अधिकार,

प्रतिस्पर्धी कीमतों पर विभिन्न प्रकार के सामान,

उत्पादों या सेवाओं तक पहुंच का अधिकार।

* सुनवाई का अधिकार, उचित मंचों पर

उपभोक्ता के हितों को उठाने का अधिकार।

* प्रतिबंधात्मक व्यापार प्रथाओं तथा

उपभोक्ताओं के शोषण के खिलाफ निवारण

के साथ ही मुआवजे की मांग करना।

 

एक करोड़ रु. तक के मामले सुनेगी जिला अदालतें

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  पहले उपभोक्ताओं के हितों के लिए सख्त कानून नहीं थे। ग्राहक संगठित

नहीं होने से उनकी आवाज सुनी नहीं जाती थी। इसलिए ग्राहक आंदोलन की.

शुरुआत हुई और 15 मार्च को अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस मनाया जाने लगा।

उपभोक्ताओं की शिकायतें निपटाने के लिए

जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उपभोक्ता

अदालतों (कंज्यूमर रिड्रेसल कमीशन) की

स्थापना की गई है। 2019 में संशोधित नए

कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट में उपभोक्ता अदालतों

को और शक्तियां देकर इनके क्षेत्राधिकार को

बढ़ाया गया है। अब जिला आयोग 1 करोड़ रुपए

तक हर्जाने का आदेश दे सकता है। राज्य आयोग

को 10 करोड़ तक का अधिकार है। वहीं, इससे

अधिक की राशि का हर्जाना करने का अधिकार

राष्ट्रीय आयोग को है, यह सब पहले नहीं होता था।

अब, कंज्यूमर द्वारा की गई शिकायत राज्य और

राष्ट्रीय सीडीआरसीज़ में फाइल की जा सकती है।

जिला सीडीआरसी के आदेश के खिलाफ राज्य

सीडीआरसी में सुनवाई होगी। राज्य सीडीआरसी

के आदेश के खिलाफ राष्ट्रीय सीडीआरसी में

सुनवाई की जाएगी। अंतिम अपील का अधिकार

सर्वोच्च न्यायालय को होगा।

 

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नए कंस्यूमर एक्ट-2019 की वशेषताएँ

* उपभोक्ता हित सर्वोपरि : यह अधिनियम 

उन मामलों के खिलाफ इस्तेमाल होगा जहां 

उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन होता 

हो। व्यापार के अनुचित तरीकों से ग्राहक 

को भ्रमित किया जाता हो। कंज्यूमर हित

प्राधिकरण के पास खुद का विंग होगा जो 

विभिन्न जांच करने के लिए स्वतंत्र रहेगा। 

इसमें इन्वेस्टीगेशन के साथ संपत्ति या वस्तु 

जब्त करने की शक्ति भी शामिल है।

* विज्ञापन पर जुर्माना : किसी उत्पाद या

सेवा का झूठा प्रचार करने या गारंटी देकर

उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाले विज्ञापन

जारी होते हैं। ऐसे विज्ञापनदाताओं के

खिलाफ इस नए कानून में कार्रवाई करने का

अधिकार है। भ्रामक विज्ञापन देने वालों पर

अधिकतम 10 लाख रुपए तक का जुर्माना

लगाया जा सकता है। दोबारा अपराध करने

पर यह 50 लाख रु. हो सकता है।

उत्पाद निर्माता पर कार्रवाई का अधिकार : खराब वस्तु बेचने के कारण ग्राहक का

नुकसान हो सकता है। यह नया कानून ऐसे उत्पाद निर्माता व्यक्ति, कंपनी के खिलाफ

कार्रवाई का अधिकार देता है। ग्राहक को हुई क्षति की पूर्ति के लिए अब वस्तु बेचने वाली

कंपनी को जिम्मेदार ठहराया जा सकेगा। ई-शॉपिंग पर भी यह लागू रहेगा।

 

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लोकपाल बैंक से शिकायत का 30 दिन में करता है समाधान

 

बैंकों से ग्राहकों काे हमेशा ही शिकायत रहती है। कई बार

बैंकों की व्यस्तता या लापरवाही के कारण शिकायतों का

ठीक से निराकरण नहीं हो पाता। इसलिए आरबीआई

ने ग्राहकों को लोकपाल नामक हथियार दिया है।

 

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              बैंक लोकपाल विभिन्न बैंकों के

   खाताधारकों की शिकायतों का त्वरित व

प्रभावी तरीके से निपटान करने के लिए शुरू

की गई यह एक निःशुल्क सेवा है। भारतीय

रिजर्व बैंक के तत्वावधान में सर्वप्रथम 1995

में 'बैंकिंग लोकपाल' की नियुक्ति की गई थी,

जो अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी होता है। यूं समझें

कि 'बैंक लोकपाल' एक स्वशासी स्वतंत्र

संस्था है, जो सभी बैंकों द्वारा दी जा रही

सेवाओं पर निगरानी रखता है। 2002 में इसमें

संशोधन किया गया। 2006 में इसका दायरा

और बढ़ाया गया, ताकि सभी व्यापारिक बैंक,

शहरी तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक व अनुसूचित

सहकारी बैंक पारदर्शी, जिम्मेदार और बिना

भेदभाव वाली सेवाएं अपने खाताधारकों

को प्रदान करें। वर्तमान में लागू योजना को

'बैंकिंग लोकपाल योजना 2006' के नाम से

जाना जाता है। बैंकिंग लोकपाल की नियुक्ति

अधिकतम तीन वर्ष के लिए की जाती है।

इसके ज्यादातर केंद्र राज्यों की राजधानियों

में हैं। उनके पते भारतीय रिर्जव बैंक की

वेबसाइट पर उपलब्ध  हैं ।

डाक या ई-मेल से भी भेज सकते हैं

शिकायतः इस सेवा के अंतर्गत अगर किसी

खाताधारी व्यक्ति को बैंक की सेवाओं या

कर्मचारियों से किसी भी तरह की शिकायत है तो

वह खुद या वकील के माध्यम से अपने राज्य के

बैंक लोकपाल को इसे भेज सकता है। शिकायत

लिखित में डाक से या ई-मेल द्वारा दर्ज कराई

जा सकती है। इस निःशुल्क सेवा केंद्र पर

अधिकतम 30 दिन में आपकी शिकायत का

निराकरण हो जाता है। लोकपाल को इतने

अधिकार हैं कि वह बातचीत अथवा शिकायत

का निराकरण करने के लिए बैंक प्रतिनिधि तथा

ग्राहक को अपनी अदालत में बुला सकता है।

यह है शिकायत करने का नियमः

अपनी शिकायत सबसे पहले बैंक अधिकारी

को करें। वहां आपकी सुनवाई नहीं होती है,

अनावश्यक देरी की जाती है या बैंक के

जवाब से आप संतुष्ट नहीं हैं तो एक माह बाद

बैंकिंग लोकपाल को सभी दस्तावेजों के साथ

शिकायत भेजी जा सकती है। यानी लोकपाल

को भेजने से पहले बैंक प्रभारी को शिकायत

करना जरूरी है।

 ये शिकायतें भेज सकते हैं

• एटीएम, क्रेडिट कार्ड व मोबाइल बैंकिंग से

संबंधित शिकायतें। बैंकों के सेल्स एजेंट्स

द्वारा वचनबद्ध सेवाएं न देने, ग्राहकों को पूर्व

सूचना दिए बिना सेवा प्रभार लगाने, छोटे

नोट व सिक्के स्वीकार नहीं करने या इस पर

कमीशन लेने।

• होम लोन, बिजनेस लोन, एजुकेशन लोन,

व्हीकल लोन या किसी भी प्रकार का बैंक

लोन समय पर मंजूर न करना। बिना कारण

बताए लोन आवेदन रद्द करना। या इसके

लिए किसी तरह की डिमांड करने या ग्राहक

को परेशान करने अथवा कर्मचारियों द्वारा

दुर्व्यवहार की शिकायतें।

• सभी प्रकार के बैंकिंग लेन-देन में ग्राहक

को परेशान किया जाना। खाता खोलने में देरी,

आनाकानी करना। बगैर उचित कारण बताए

खाता बंद करना। सूचना दिए बगैर किसी

तरह का प्रभार लगाना या जुर्माना लगाकर

आपके खाते से राशि काट लेना। किसी बैंक

एजेंट द्वारा वसूली की धमकी देना।

 

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बैंक से मिली मानसिक प्रताड़ना तो एक लाख का मुआवजा

इस सेवा में यह शर्त भी शामिल है कि जब कोई

व्यक्ति शिकायत में जीत जाता है तो बैंक फैसले

की कॉपी अपने सूचना बोर्ड पर लगाए। ताकि

अन्य ग्राहक उसे पढ़कर अपने अधिकार समझ सकें।

आरबीआई ने लोकपाल को कई

अधिकार दिए हैं। शिकायतों पर गंभीरता

से विचारकर दोनों पक्षों में सहमति

बनवाना प्रमुख कार्य है। उसे यह ध्यान भी

रखना है कि उसके पास आई जानकारी

गोपनीय रहे। संबंधित व्यक्ति की अनुमति

के बिना उसकी कोई जानकारी वह

किसी और से साझा नहीं करेगा। जिस

भी बैंक शाखा के खिलाफ शिकायत

आएगी, उसके नोडल अधिकारी के नाम

लोकपाल कार्यालय से शिकायत की एक

कॉपी निर्देशों के साथ भेजी जाती है। फिर

नोडल अधिकारी शिकायतकर्ता और बैंक

के बीच सुलह करवाने का प्रयास करता

है। लोकपाल मामला सुलझाने के लिए

ऐसी किसी भी प्रक्रिया को आपना सकता

है, जिसे वह न्यायोचित समझे। इसके

अलावा लोकपाल को लगता है कि किसी

मामले में दोनों पक्षों को समझौता कर

लेना चाहिए। और दोनों पक्ष उसके इस

फैसले पर तय समय में अमल नहीं करते 

हैं तो वह शिकायत को रद्द कर सकता है.

 

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  लोकपाल की शक्तियां

• शिकायत सही पाए जाने पर लोकपाल ग्राहक

की पीड़ा, उसे हुई मानसिक परेशानी तथा

शिकायतकर्ता द्वारा किए गए खर्च के लिए

अधिकतम एक लाख रुपए मुआवजा देने का

आदेश जारी कर सकता है।

• उसे यह शक्ति नहीं है कि ऐसा कोई अवॉर्ड

पारित करे जो ग्राहक को हुई हानि से अधिक राशि

का हो। इसकी अधिकतम सीमा 10 लाख रु.

तक है। अवॉर्ड पारित करने की एक सीमा तय है।

. . . वर्ना मामला रद्द हो जाएगा

जिस बैंक के खिलाफ लोकपाल ने कोई फैसला

दिया है, वह बैंक पर तब तक लागू नहीं माना

जाएगा, जब तक ग्राहक पत्र जारी होने के 15

दिन के भीतर 'मामला निपटान का स्वीकृति-

पत्र' नहीं दे देता। ग्राहक ने अपनी व्यस्तता के

चलते यहां समय का ध्यान नहीं रखा तो फैसला

16वें दिन अपने आप रद्द मान लिया जाएगा।

आपकी शिकायत रद्द करने के कुछ कारण

• लोकपाल को लगता है कि शिकायत सिर्फ परेशान करने के लिए है। बगैर किसी

कारण या दुर्भावना से प्रेरित होकर की गई है तो वह उसे अस्वीकार कर सकता है।

• उसे लगे कि मामला अधिकार क्षेत्र से बाहर है। या सबूत अधूरे लगें, संबंधित व्यक्ति

बयान देने हाजिर न हो अथवा शिकायत कार्रवाई के लायक न हो।

• उसे लगे कि इस मामले में निर्णय नहीं दिया तो भी चलेगा, क्योंकि इससे

 शिकायतकर्ता को कोई लाभ या हानि नहीं होगी। या उसे लगता है कि इस विषय पर कार्रवाई उचित नहीं है तो लोकपाल निर्णय अंतिम होगा।

म्यूचअल फंड, बीमा संबंधी शिकायत भी सुनेगा लोकपाल 

लोकपाल सेवा के अंतर्गत ग्राहक अब शिकायत के

उन मामलों की भी अपील कर सकते हैं जो क्लोज कर

दिए गए हैं। यानी आप किसी फैसले से संतुष्ट नहीं हैं तो

अपना केस रि-ओपन करा सकते हैं।

बैंकिंग लोकपाल सेवा को संशोधित कर अब

इसका दायरा बढ़ा दिया गया है। भारतीय रिजर्व

बैंक (आरबीआई) द्वारा अपने कार्यक्षेत्र में

लोकपालों को अब नई जिम्मेदारी दी गई है,

जिसमें इंश्योरेंस पॉलिसी या म्यूचुअल फंड

स्कीम जैसे थर्ड पार्टी प्रॉडक्ट्स से संबंधित

शिकायतें सुनने का अधिकार भी रहेगा।

म्यूचुअल फंड में निवेश को लेकर लोगों का

रुझान बढ़ा है। इसलिए म्यूचुअल फंड तथा

जीवन बीमा निगम में भ्रामक जानकारी देकर

पॉलिसी बेचने या निवेश करवाने की शिकायतें

लगातार मिल रही हैं। निवेशकों के साथ

धोखाधड़ी के मामले सामने आने के बाद ऐसे

लोगों की परेशानी दूर करने के लिए लोकपाल

को यह मामले भी निपाटने होंगे। इसके अलावा

मोबाइल और डिजिटल बैंकिंग सर्विस में कोई

कमी पाए जाने पर भी संबंधित बैंक शाखा

के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई जा सकती

है। संशोधित सेवा में लोकपाल द्वारा जारी की

जाने वाली अवॉर्ड राशि की सीमा 10 लाख से

बढ़ाकर 20 लाख कर दी गई है। यहां हम कुछ

प्रश्नों के उत्तर दे रहे हैं-

सामान्य तौर पर पूछे जाने वाले प्रश्न

अॉनलाइन शिकायत दर्ज कैसे कराएं?

www.bankingombudsman.rbi.org.in

परं ऑनलाइन अथवा इ मेल भेजकर अपनी

शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इसके अलावा

शिकायत का एक निर्धारित फॉर्म भी बैंकों में

उपलब्ध है, उसे भरकर भेज सकते हैं। आप

ज्यादा जानकारी नहीं रखते हैं तो सादे कागज

पर शिकायत लिखकर भी लोकपाल को डाक

से भेज सकते हैं।

कितने बैंकिंग लोकपाल नियुक्त हैं?

21 बैंकिंग लोकपाल हैं। ज्यादातर राज्य की

राजधानियों में स्थित हैं। आरबीआई की साइट

से इनके एड्रेस ले सकते हैं।

आवेदन में क्या विवरण जरूरी हैं?

शिकायतकर्ता का नाम-पता। बैंक शाखा का

नाम-पता। क्या शिकायत है, उसके दस्तावेज।

लोकपाल द्वारा जारी अवॉर्ड बैंक को मंजूर

नहीं तो क्या होगा?

आपकी तरह बैंक के पास भी ऑप्शन है

कि वह इस फैसले के खिलाफ अपीलीय

प्राधिकारी के सामने अपील दायर करे।

लोकपाल को कोई कानूनी शक्ति है?

हां, वह अर्द्ध न्यायिक प्राधिकरण है। मध्यस्थता

के लिए बैंक और ग्राहक को अपने पास बुलाने

की शक्ति है।

एनआरआई की शिकायतें भी सुनी जाती हैं?

हां, ऐसे अनिवासी भारतीय जो भारत की बैंक

में विदेश से धन जमा कराते हैं। किसी प्रकार का

लेन-देन करते हैं, उनकी शिकायतें सुनता है।

मैं लोकपाल और अपीलीय अधिकारी के

निर्णय से संतुष्ट नहीं हूं, क्या करूं?

ऐसे में आप आरबीआई को शिकायत भेज

सकते हैं, क्योंकि ये दोनों अधिकारी उसी के

द्वारा तय किए गए हैं। इसके अलावा उपभोक्ता

फोरम में मामला ले जाने का ऑप्शन तो

आपके पास है ही।

    

                    THANK YOU FOR VISITING

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