Vehicle-Insurance/वाहन-बीमा


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भविष्य में संभावित नुकसान की भरपाई करता है बीमा

बीमा हमारे व हमारे परिवार के लिए भविष्य में किसी नुकसान की 

आशंका से निपटने का हथियार व एक साधन है। हमें नहीं पता कि 

कल आने वाले दिनों में क्या होगा, इसलिए हम बीमा पॉलिसी के 

द्वारा भविष्य में संभावित नुकसान की भरपाई की कोशिश करते हैं।

भारत में वाहन रखने वालों को वाहन का बीमा करवाना अनिवार्य है, चाहे आप दो पहिया वाहन खरीदें 

या कार या फिर कमर्शियल वाहन। एक अच्छी वाहन बीमा पॉलिसी का चयन आप तभी कर सकते हैं, 

जब आपको व्हीकल इंश्योरेंस के बारे में बेसिक जानकारी पहले से हो। इस सीरीज में हम इस विषय 

से जुड़ी प्रमुख बातें बताएंगे, जो वाहन बीमा कराने से पहले आपको पता होनी चाहिए। आज के व्यस्त

जीवन में जब आप अपना वाहन लेकर सड़क पर आते हैं तो बेतरतीब ट्रैफिक के कारण अगले पल 

क्या होगा? किसी को पता नहीं होता।हमारे यहां सबसे बड़ी समस्या है यातायात के नियमों का पालन 

नहीं करना। यदि आपने अपने वाहन का इंश्योरेंस कराया हुआ है तो आपके वाहन में हुई टूट-फूट या 

सामने वाले के वाहन की टूटफूट अथवा उसकी संपत्ति को हुए नुकसान पर बीमा कंपनी हर्जाना 

चुकाती है। आपके वाहन से कोई घायल होता है या कोई अनहोनी होती है तो उसके लिए तय किए 

गए हर्जाने की राशि आपकी बीमा कंपनी अदा करती है। इन सब परेशानियों से बचने के लिए व्हीकल 

इंश्योरेंस बहुत जरूरी है। सरल शब्दों में कहें तो भविष्य  में अप्रत्याशित वाहन दुर्घटना के कारण 

वाहन को हुए नुकसान या क्षति की भरपाई करने वाला अनुबंध है यह बीमा।

व्हीकल इंस्युरेन्स में हैं तीन श्रेणियां    

वाहन बीमा को तीन श्रेणियों में बांटा गया है। इन श्रेणियों के अनुसार ही जोखिम के लिए देय राशि और प्रीमियम तय की जाती है। इसके अनुसार -

ए: निजी कार बीमा- यह सभी निजी कारों के लिए मान्य है जो कार से जुड़े जोखिम में आपकी मदद 

करता है। कमर्शियल उपयोग की जाने वाली कारों के लिए मान्य नहीं। 

बी: टू व्हीलर बीमा- इसमें बाइक, स्कूटर आदि शामिल हैं। यह आपको किसी भी जोखिम के लिए 

कवरेज देता है। 

सीः कमर्शियलवाहनबीमा-माल ढोने या यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए 

जिन वाहनों का उपयोग किया जाता है, उनके लिए यह बीमा चोरी या व्यावसायिक वाहन में नुकसान 

होने पर खर्च की भरपाई करता है। इसके अलावा, बीमाधारक को इस प्रकार के बीमा के साथ वाहन 

चालक के लिए थर्ड पार्टी लाइबिलिटी और दुर्घटना कवरेज से सुरक्षा देता है। इस तरह के वाहनों में 

बसें,ट्रक, लोडिंग रिक्शा, टैक्सी कारें, अंतिम संस्कार वैन, एंबुलेंस, मोबाइल डिस्पेंसरी, प्रचार वाहन 

आदि सभी शामिल हैं।

चालक का लाइसेंस वैध होने पर ही मिलेगा क्लेम

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व्हीकल इंश्योरेंस में सभी प्रकार के वाहनों का बीमा शामिल है। यह किसी भी दुर्घटना, चोरी या 

नुकसान से संबंधित फाइनेंशियल सुरक्षा प्रदान करता है। साथ ही किसी तरह की शारीरिक चोट को

भी कवर करता है।

मोटर वाहन अधिनियम 1988 की धारा 140 में 'कोई गलती नहीं' वाले फॉर्मूले के अनुसार मोटर 

वाहन मालिक की ओर से मुआवजे की राशि मृत्यु के केस में 50,000 रु. और किसी व्यक्ति की 

स्थायी अपंगता के लिए 25,000रु. तय है। इसके अलावा सार्वजनिक स्थान पर सार्वजनिक सेवा के 

वाहन से किसी यात्री की मृत्यु या शारीरिक चोट के संबंध में दिए जाने वाले हर्जाने की राशि 

असीमित है। लेकिन, इस बात का ध्यान रखें कि वाहन बीमा पॉलिसी की कुछ जरूरी शर्तें भी हैं, 

जिनके तहत बीमा कंपनी आपकी तरफ से हर्जाने की राशि अदा नहीं करेगी। इन शर्तों में शामिल है- 

वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं होना। शराब या ड्रग्स के नशे में हादसा कर देना। भौगोलिक सीमाओं से 

परे दुर्घटना होना तथा गैरकानूनी उद्देश्य में वाहन का इस्तेमाल होना आदि। वैसे सितंबर 2019 

से,वाहन इंश्योरेंस में कई नए नियम जुड़ गए हैं, कुछ सुविधाएं एक पैकेज के रूप में दी जा रही हैं, 

जिनकी जानकारी आपको अगले भाग में देंगे।

                 ये कारण भी शामिल हैं वाहन बीमा कवरेज में जैसे- अग्नि, विस्फोट, बिजली से 

हानि, चोरी, दंगा और हड़ताल में नुकसान,भूकंप, बाढ़, तूफान, चक्रवात, तबाही,बाढ़ ओलावृष्टि से 

हानि,पारगमन में रेल / सड़क से, अंतर्देशीय जलमार्ग, लिफ्ट, लिफ्ट या वायु, लैंड स्लाइड / रॉक 

स्लाइड आदि से होने वाली हानि शामिल है।

                      व्हीकल इंस्युरेन्स के प्रकार

 

फर्स्ट पार्टी बीमा या कम्प्रेहेन्सिव बीमा : इस प्रकार का बीमा आप और आपके वाहन को हुई हानि को 

तो कवर करता ही है,तीसरे पक्ष को हुए किसी तरह के नुकसान को भी कवर करता है। बीमित वाहन 

द्वारा दुर्घटना के कारण चालक, मालिक और यात्रियों की मृत्यु या विकलांगता को भी कवर देता है।

अपने विवेक से चुनें प्लानः व्हीकल इंश्योरेंस के हमने दो प्रकार आपको बताए हैं। यह आप पर निर्भर 

है कि डिटेल में स्टडी करने के बाद किसी एक प्लान को चुन लें। आप तय करें कि आपको किस 

तरह के कवरेज की जरूरत है।

थर्ड पार्टी बीमा: इस प्रकार के बीमा में आपके बीमित वाहन से किसी तीसरे पक्ष या उनकी संपत्ति 

को हुए नुकसान का खर्च कवर किया जाता है।कानून के अनुसार, दुर्घटनाओं में गंभीर चोट, विकलांगता

या व्यक्ति की मृत्यु, उनकी संपत्ति को हानि के मामले में तीसरे पक्ष को मुआवजा देना अनिवार्य 

होता है।

दूसरी बार गलती पर चार गुना जुर्माना देना पड़ेगा

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वाहन बेचने वाली कंपनियां भी वाहन के साथ इंश्योरेंस कर देती हैं। 

ऐसा वे बीमा कंपनियों के साथ समझौता करके करती हैं। जरूरी 

नहीं कि आप उन्हीं से बीमा कराएं, आप अपनी पसंद की किसी 

कंपनी से भी करा सकते हैं।

बिना इंश्योरेंस कराए वाहन को सड़क पर लाना मोटर व्हीकल एक्ट के अंतर्गत गंभीर अपराध माना 

गया है। ऐसे में कोई दुर्घटना हो गई तो वाहन तो जब्त होगा ही, आर्थिक रूप से भी आपको भारी 

हानि उठानी पड़ेगी। सामने वाले को हुए नुकसान का भुगतान जेब से करना पड़ेगा। पुलिस-कोर्ट के 

चक्कर में फंसेंगे वह अलग। एक बात और याद रखें कि पहले बिना इंश्योरेंस के वाहन चलाते पकड़े 

जाने पर 1,000रु. जुर्माना भरकर काम चल जाता था,लेकिन 'नया मोटर वाहन अधिनियम 2019' 

लागू होने के बाद यह राशि दोगुनी हो गई है, यानी आपको जुर्माने के 2,000 रु. देने पड़ेंगे। यदि इसी

अपराध में दूसरी बार पकड़े गए तो जुर्माना 4,000 रु. हो जाएगा। इस सब परेशानियों से बचने के 

लिए अपने वाहन का बीमा कराने के बाद ही वाहन सड़क पर लाना चाहिए।

                     'ऐड-ऑन' : कवरेज राशि बढाने के लिए 

वाहन बीमा कराते वक्त आपको यह सुविधा भी मिली हुई है कि आप अतिरिक्त प्रीमियम चुकाकर 

'ऐड-ऑन' हासिल कर सकें। ऐड- ऑन कवरेज बढ़ाने का अच्छा तरीका है। नए वाहनों के लिए जीरो 

डैप्रिसिएशन ऐड-ऑन अनिवार्य है, क्योंकि यह 'देय दावे' को बढ़ाता है। अगर वाहन पुराना है तो ऐड-

ऑन कवर का फायदा नहीं। इसी प्रकार यदि आप ऐसे इलाके में रहते हैं जहां बाढ़ का जोखिम है तो 

इंजन प्रोटेक्ट' ऐड-ऑन लेने की सलाह दी जाती है। यदि आपके इलाके में बाढ़ नहीं आती या मानसून 

में पानी जमा नहीं होता तो इस प्रकार का ऐड-ऑन आपकी प्रीमियम राशि को बढ़ाएगा ही। इसलिए, 

मोटर इंश्योरेंस पॉलिसी कवरेज को चुनते वक्त ध्यान रखें और उतने कवर के लिए ही भुगतान करें, 

जितनी आपको जरूरत है।

                   इस तरह तय होता है वाहन बीमा में प्रीमियम

आपके वाहन की प्रीमियम क्या होगा, वह कुछ बातों पर निर्भर करता है। जैसे कि वाहन का मूल्य, 

वाहन किस राज्य-शहर में पंजीकृत है, व्हीकल मेक, मॉडल एंड पोटेंशियल रिस्क फैक्टर इससे जुड़े 

होते हैं। इसके अलावा नो क्लेम बोनस, आपने कभी क्लेम लिया हो तो उसकी जानकारी, व्यक्ति की 

आयु और आपके ड्राइविंग का इतिहास आदि।

यह है नया नियमः दोपहिया वाहनों के लिए कम से कम तीन वर्ष का थर्ड पार्टी बीमा और चार पहिया

वाहनों के लिए कम से कम पांच वर्ष का थर्ड पार्टी बीमा करवाना अनिवार्य है। मोटर साइकिल, स्कूटर 

वगैरह के लिए इस बीमा के साथ बीमा कंपनियों को 1 लाख रुपए का व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा भी 

अनिवार्य रूप से देना होग।

पैकेज पॉलिसी खरीदना फायदेमंद होगा आपके लिए

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एक स्थापित ब्रांड प्रतिष्ठा और वित्तीय स्थिरता के साथ सर्वश्रेष्ठ 

बीमा कंपनी चुनें। यह देखें कि कंपनी कितने समय से काम कर 

रही है, उसके पास क्या अनुभव है और उसने अब तक कितनी 

नीतियां जारी की हैं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बीमा रेगुलेटरी  इरडा ने सभी जनरल इंश्योरेंस कंपनियों को निर्देश दिए 

हैं कि अब नया वाहन खरीदने वालों के लिए थर्ड पार्टी व्हीकल इंश्योरेंस लेना अनिवार्य हो गया है। 

नए नियम आने के बाद आपके सामने व्हीकल इंश्योरेंस के तीन ऑप्शन मौजूद हैं- लॉन्ग टर्म पैकेज,

बंडल्ड पैकेज और अलग से थर्ड पार्टी कवर। वैसे पैकेज पॉलिसी खरीदना आपके लिए फायदेमंद होगा। 

आइए इन तीनों विकल्पों को ऐसे समझें-

                      लॉन्ग टर्म पैंकेज कवर

3 या 5 वर्ष वाले इस थर्ड पार्टी इन्सुरेंस में वाहन को होने वाले नुकसान (two wheeler) के लिए 

कवर देगा। इसमें थर्ड पार्टी के साथ फर्स्ट पार्टी बीमा (ओडी यानी ऑन डैमेज) भी शामिल है। One- 

time payment करने वालों के लिए यह विकल्प ठीक है। हालांकि, एक वर्ष बाद ऑन डैमेज प्रीमियम 

की कम दरों की पेशकश करने वाली बीमा कंपनी में स्विच करने का विकल्प नहीं होगा।

                       अलग थर्ड पार्टी कवर

इसमें बिना ओडी के साथ 3 वर्ष का थर्ड पार्टी कवर मिलेगा। यानी थर्ड पार्टी कवर आपको अलग से 

लेना पड़ेगा। ऐसा करने से प्रीमियम जरूर बचेगा, लेकिन वाहन को नुकसान के लिए आपके पास कोइ 

कवर नहीं होगा। वाहन चोरी या दुर्घटना में बीमा कंपनी हर्जाना नहीं देगी।

                          बंडल्ड कवर 

3 या 5 वर्ष के इस थर्ड पार्टी इंश्योरेंस में ऑन डैमेज कवर 1 वर्ष का ही मिलेगा। यानी जो लोग 

कम प्रीमियम देना चाहते हैं, वे इस ऑप्शन को चुन सकते हैं। हालांकि, इसमें भी स्विच करने का 

विकल्प नहीं होगा। इस विकल्प में दूसरी बीमा कंपनी की सेवा लेने के लिए पुरानी पॉलिसी की ओडी 

को दो वर्ष के लिए कैंसल कराकर सिर्फ ओडी के लिए पॉलिसी लेनी होगी।

 

ठीक से समझे प्लान :-

कार या बाइक खरीदते समय ज्यादातर लोग डीलर से ही इंश्योरेंस खरीद लेते हैं। पहले की तुलना में 

अब एडवांस भुगतान की रकम ज्यादा होगी, इसलिए सोच-समझकर पॉलिसी लें। साथ ही इंश्योरेंस 

प्लान लेने से पहले सभी तरह के विकल्पों को देख लें। याद रखें कि यदि आप केवल लायबिलिटी 

ओनली पॉलिसी लेते हैं, तो आपके वाहन की क्षति को कवर नहीं किया जाएगा। इसलिए, पैकेज 

पॉलिसी लेना समझदारी होगी जो आपके वाहन के लिए कवर सहित एक व्यापक कवर देगी।

बीमा कंपनी देती है ₹7.5 लाख तक का मुआवजा 

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 वाहन बीमा पॉलिसी केवल उस कंपनी से खरीदना बेहतर होता है, 

जिसके पास पैन-इंडिया में डिस्ट्रीब्यूटर व ब्रांच ऑफिस का मजबूत 

नेटवर्क हो ।इससे आपके वाहन में हुई टूट-फूट के समय आपको 

कैशलेस की बेहतरं सर्विस मिल सकेगी।

जब किसी व्यक्ति के व्हीकल से दुर्घटना हो जाती है तो सामने वाला पार्टी जिसका नुकसान हुआ है, 

वह आपसे हर्जाना वसूलने के लिए कोर्ट में आपके खिलाफ मामला दर्ज कराता है। सबूतों के आधार 

पर कोर्ट में मुआवजा राशि तय होती है।ऐसी स्थिति में थर्ड पार्टी व्हीकल इंश्योरेंस आपके काम आता 

है।लेकिन याद रखें, इंश्योरेंस कंपनी अधिकतम 7 लाख 50 हजार रुपए तक का ही मुआवजा दे सकती 

है। इससे अधिक राशि हुई तो बाकी आपको अपनी पॉकेट से देनी पड़ेगी। हालांकि, मृत्यु या गंभीर 

चोट के मामले में मुआवजे की सीमा तय नहीं है। ऐसे मामले में जितना कोर्ट तय करे, उतना इंश्योरेंस

कंपनी देने के लिए मजबूर होती है। नुकसान के मुआवजे का दावा एक बार से ज्यादा नहीं किया जा 

सकता।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न तथा उत्तर

1. टूव्हीलर का बीमा करवाने में व्यक्तिगत दुर्घटना भी कवर होती है क्या?

हां, नए नियम के अनुसार वाहन मालिक का व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा भी कवर होता है। ऐसी कई

बीमा कंपनियां हैं जो अतिरिक्त प्रीमियम भुगतान करने पर बड़ी राशि वाला व्यक्तिगत दुर्घटना कवर

देती हैं। इसके अलावा, पिछली सीट पर बैठी सवारी के लिए भी दुर्घटना कवर ले सकते हैं, इसके लिए

अतिरिक्त प्रीमियम चुकानी होगी।

2. कैशलेस गैरेज सुविधा का लाभ कैसे उठाएं?

कैशलेस गैरेज सुविधा का लाभ उठाने के लिए यह जरूरी है कि वाहन की क्षति होने पर उसकी 

मरम्मत बीमा कंपनी के अधिकृत गैरेज में की जाएगी। इसके लिए ऑनलाइन नेटवर्क गैरेज की सूची 

देखें।

3. टूव्हीलर बीमा पर जीएसटी है क्या?

पहले सेवा कर और सेस कर 15% था, लेकिन जीएसटी के बाद आपको दोपहिया वाहन बीमा पॉलिसी 

खरीद पर 18% जीएसटी देना होगा।

4. दुर्घटना के बाद वाहन मालिक के खिलाफदावा कौन दायर कर सकता है?

जिसकी प्रॉपर्टी को नुकसान हुआ है उसका मालिक, उसका वकील या मृतक का कानूनी वारिस।

5. दुर्घटना में घायल होने पर या मृत्यु के मामले में मुआवजा कैसे तय होता है?

ऐसे मामलों में थर्ड-पार्टी कवर की लिमिट नहीं बताई जाती है। कोर्ट द्वारा राशि तय होने के बाद ही

पूरा मुआवजा बीमा कंपनी देती है।

6. दोपहिया वाहन में ऐड ऑन कवर क्या है?

कई ऐड-ऑन हैं जिन्हें आप अपनी व्यापक पॉलिसी से जोड़ सकते हैं जैसे कि पीछे की सीट पर सवारी

करने वाले सवार को व्यक्तिगत दुर्घटना कवर, शून्य मूल्यह्रास, इंजन संरक्षण, एनसीबी संरक्षण कवर,

चालान पर वापसी, सड़क के किनारे सहायता, उपभोग्य कवर, इत्यादि।

    🙏 🙏                            🙏 🙏 🙏                         🙏 🙏       

*Note:- All the alphanumeric values are changing from time to time. please concern your insurance company to get updated of new policy & regulation. thank you!!

  
                Property Registration/प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन                                                             
 

 


Property Registration/प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन


Property ke sabhi tarh k problem (viwad/conflicts) se bachati hai Registry

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संपत्ति किसी भी रूप में आपको मिल सकती है, जैसे- आपने खुद 

खरीदी हो। दूसरो के द्वारा दान या उपहार में मिली हो।पट्टे(lease) 

की हो, जायदाद में हिस्सा मिला हो। जैसे भी संपत्ति आपको 

मिलती है, तुरंत उसकी रजिस्ट्री करा लेना चाहिए।

पंजीकरण अधिनियम 1908 के सेक्शन 17 के अनुसार वह सभी लेनदेन, जिसमें किसी भी प्रकार की 

100 रुपए से अधिक कीमत वाली चल-अचल संपत्ति की बिक्री शामिल होती है, वैसे सभी लेनदेन में 

पंजीकरण कराना अनिवार्य होता है। इसका मतलब यह है, कि चल-अचल संपत्ति की बिक्री से जुड़े 

सभी लेनदेन को पंजीकृत कराया जाना चाहिए। इसी के साथ, अचल संपत्ति के किसी भी गिफ्ट के 

साथ 12 महीनों से ज्यादा की अवधि/period के लिए lease पर दी गई संपत्ति को भी अनिवार्य रूप 

से पंजीकृत कराना जरूरी है। साफ शब्दों में यूं समझें कि संपत्ति खरीदना लोगों के लिए सबसे 

महत्वपूर्ण निवेश में से एक है, इसलिए तुरंत रजिस्ट्री कराकर संपत्ति पर कानूनी रूप से अधिकार 

हासिल कर लेना यह आपके लिए अच्छा रहेगा।इसके अलावा रजिस्ट्रीकरण आपको किसी भी विवाद से 

बचाता है। एक बात और, यह संपत्ति आप किसी अन्य व्यक्ति से खरीदते हैं, यदि आपने समय पर 

इसे अपने नाम नहीं कराई तो हो सकता है कोई दूसरा उस पर दावा कर दे। कानून भी आपका साथ 

तभी देगा जब रजिस्ट्री आपके नाम हो चुकी हो। इस सीरीज में हम आपको प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन के बारे 

में जानकारी देंगे।

संपत्ति के प्रकार

संपत्ति दो प्रकार के होते हैं। एक, चल संपत्ति और दूसरी अचल संपत्ति। चल संपत्ति में वह है 

जिसका आकार, प्रकार बदले बिना एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित की जा सकती है। 

अचल संपत्ति में जमीन, जायदाद, घर, खेत आदि आते हैं।

दस्तावेजों का रजिस्ट्रेशन

स्टैंप ड्यूटी पेय करने के बाद दस्तावेजों को इंडियन रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत कराया जाना 

जरूरी है।जिस इलाके में आपका प्रॉपर्टी है, उसके न्यायिक क्षेत्र में आने वाले सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में 

यह प्रक्रिया पूरी होती है।दस्तावेजों के पंजीकरण का बुनियादी मकसद दस्तावेजों को अमल में लाना 

होता है। ज्यादातर राज्यों में रजिस्ट्रेशन फीस स्टैंप ड्यूटी का कुछ प्रतिशत तय है। जब तक सरकारी 

रिकॉर्ड्स में डीड खरीददार के नाम नहीं लिखी जाती, जब तक वह घर का आधिकारिक मालिक नहीं 

माना जाता। रजिस्ट्रेशन की एक असली कॉपी रजिस्ट्रार के पास रहती है, जिसे किसी विवाद के वक्त 

रेफर किया जा सकता है।

 

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Kisi wakil se property deed ko satyapit/verify karaye

आमतौर पर आपके दस्तावेज़ों को पंजीकरण करने के लिए 15 दिन का समय लगता है। अगर आपने 

गृह ऋण लिया है तो बैंक प्रतिनिधि दस्तावेज लेने आएगा या आप बैंक जाकर दस्तावेज जमा कर

सकते हैं।

जमीन पर बना घर, प्लाट, फ्लैट या कोई जमीन खरीदना किसी भी व्यक्ति के जीवन में सबसे जरूरी 

काम में से एक होता है। व्यक्ति अपनी पूरा जमा पूंजी अथवा बैंक से कर्ज लेकर प्रॉपर्टी खरीदता है। 

इसलिए जरूरी है कि इसमें अतिरिक्त सावधानी बरती जाए जिससे कोई आपकी मेहनत की कमाई 

हथिया न सके या धोखे से आप गलत प्रॉपर्टी न खरीद लें। इसके लिए जरूरी है कि खरीदी गई प्रॉपर्टी 

के सभी दस्तावेज किसी जानकार को दिखवा लें। हर कागजात को सावधानी से चेक करने के बाद ही 

सौदा आगे बढ़ाना चाहिए। हम आपको उन दस्तावेजों की जानकारी दे रहे हैं, जिन्हें चेक कर आप 

घपलेबाजी से बच सकें।

रजिस्ट्री कराने से पहले इन दस्तावेजों को ठीक से जांच ले 

सेल डीड : यह कानूनी दस्तावेज प्रॉपर्टी के मालिकाना हक की पुष्टि करता है। यह सबूत है कि 

पुराने मालिक से प्रॉपर्टी मौजूदा विक्रेता को ट्रांसफर की गई। यह भी सुनिश्चित करें कि प्रॉपर्टी 

बेचनेवाले के नाम दर्ज हो। अच्छा तरीका यह है कि किसी वकील से प्रॉपर्टी डीड को सत्यापित कराएं।

• बिल्डिंग प्लान अप्रूवल : बिल्डिंग में फ्लैट खरीद रहे हैं तो पता करें कि बिल्डर ने बिल्डिंग प्लान 

अथॉरिटी के कमिशनर या उनके द्वारा नियुक्त अधिकारी से अप्रूव कराया है या नहीं। इससे पता 

चलेगा कि बिल्डिंग कानूनी तरीके से बनी है।

• लोन सर्टिफिकेट : यह सर्टिफिकेट सुनिश्चित करता है कि संबंधित प्रॉपर्टी पर कोई लोन या अन्य 

देनदारी तो नहीं है? मतलब यह कि आप जो प्रॉपर्टी खरीद रहे हैं वह हर तरह के कर्जमुक्त हो। दूसरे 

शब्दों में यह सर्टिफिकेट किसी मोर्गेज, टाइटल ट्रांसफर या कानूनी रूप से रजिस्टर्ड ट्रांजेक्शन का 

सबूत है जिससे प्रॉपर्टी पर कोई सवाल न उठे।

• कंप्लीशन सर्टिफिकेट : स्थानीय निकाय द्वारा जारी यह सर्टिफिकेट साबित करता है इस प्रॉपर्टी का 

निर्माण उसके दिशा निर्देशों के हिसाब से हुआ है। यह पानी, बिजली, सीवर जैसी बेसिक जरूरतों के 

हिसाब से बहुत आवश्यक सर्टिफिकेट है। अगर यह नहीं मिला तो प्रॉपर्टी में बेसिक सुविधा जुटाना व 

हासिल करना मुश्किल हो सकता है।

• ऑक्युपेंसी सर्टिफिकेट : कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी करने के बाद स्थानीय निकाय (नगर निगम या 

अथॉरिटी) ऑक्युपेंसी सर्टिफिकेट जारी करता है। इस सर्टिफिकेट से पता चलता है कि निवास करने के 

लिए बनी इस प्रॉपर्टी का निर्माण सभी नियमों का पालन करते हुए किया गया है।

पॉवर ऑफ एटॉर्नी : यह एक कानूनी दस्तावेज है जिसकी मदद से कोई व्यक्ति किसी अन्य को 

प्रॉपर्टी की देखभाल, किराए पर उठाने या बेचने के लिए अधिकृत करता है। हालांकि, इसका भी 

रजिस्ट्रेशन कराया जाना जरूरी है।

Registry ke liye badhwa sakte hai aur 4 mahine ki awadhi

स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन चार्ज बचाने के लिए कई लोग पॉवर ऑफ एटॉर्नी के जरिये प्रॉपर्टी खरीद 

लेते हैं। धोखा यह होता है कि इसमें एक ही प्रॉपटी कई लोगों को बेच दी जाती है और आप मुकदमे 

बाजी में फंस जाते हैं।

स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन शुल्क राज्य सरकार के खाते में जाता है। चूंकि यह राज्य का विषय है, 

इसलिए विभिन्न राज्यों में रजिस्ट्री की दरें अलग हो सकती हैं। शहरी इलाकों में स्टांप ड्यूटी ज्यादा

होती है। जब आप प्रॉपर्टी संबंधी सभी दस्तावेजों की फाइल तैयार कर लेते हैं तो उसके बाद आपको 

रजिस्ट्रार ऑफिस में जाकर इनका पंजीकरण कराना होता है। इसके लिए कुछ फीस लगती है। 

दस्तावेज पंजीकृत कराने के बाद का अगला कदम है स्टांप शुल्क के मूल्य के बराबर स्टांप पेपर 

खरीदने की। आप चाहें तो स्टांप पेपर ऑनलाइन (ई-स्टांप पेपर) खरीद सकते हैं या लाइसेंस प्राप्त 

किसी स्टांप विक्रेताओं से भी ले सकते हैं। स्टांप ड्यूटी का ऑनलाइन भुगतान भी कर सकते हैं। 

स्टांप ड्यूटी चुकाने की रसीद के साथ आप अपने दस्तावेज उस इलाके के सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में 

जमा कराएं जिस इलाके में आप प्रॉपर्टी खरीद रहे हैं। संपत्ति की रजिस्ट्री कराते वक्त बेचवाल और 

खरीदार दोनों को दो गवाहों के साथ उपस्थित होना होता है। अतः आप अपने गवाह साथ लेकर जाएं। 

दोनों पार्टियों के अपने-अपने आईडी प्रूफ जैसे कि आधार कार्ड, पैन कार्ड या सरकार द्वारा जारी किया 

गया कोई पहचान-पत्र भी चाहिए होते हैं। इसके बाद संपत्ति आपके नाम दर्ज हो जाती है, जिसे 

रजिस्ट्री करान कहते हैं। सभी दस्तावेज स्कैन कर आपको लौटा दिए जाते हैं।

         स्टांप ड्यूटी हजारों या कुछ लाख रुपए हो सकती है। ऐन वक्त पर आपके पास इतने पैसे 

का इंतजाम नहीं है तो दस्तावेजों का पंजीयन कराने के बाद आपको चार महीने का समय दिया जाता 

है रजिस्ट्री कराने के लिए। आप चाहें तो चार महीने बाद एप्लिकेशन देकर फिर से चार महीने की 

मोहलत मांग सकते हैं पैसों के इंतजाम के लिए।

सामान्य तौर पर पूछे जाने वाले प्रश्न-उत्तर

✋ संपत्ति पंजीकरण का उद्देश्य क्या है?

- पंजीकरण कानूनी रूप से जरूरी है। संपत्ति पंजीकृत होने का मतलब है कि अब इसके मालिक आप 

ही हैं कोई और नहीं। यह हस्तांतरण दस्तावेज एक सार्वजनिक रिकॉर्ड बन जाता है।

विरासत में अर्जित संपत्ति का हस्तांतरण जरूरी है?

- नहीं। एक संपत्ति के मालिक की मृत्यु बाद उसके उत्तराधिकारी द्वारा मृत्यु प्रमाण-पत्र की कॉपी 

जमा करने पर संपत्ति उत्तराधिकारी के नाम हो जाती है।

चैरिटेबल ट्रस्ट को संपत्ति दान करने पर स्टांप ड्यूटी चुकानी होगी?

- यह आपके राज्य के कानून और किस तरह डीड बनवाई गई है, उस पर निर्भर करता है। चैरिटेबल 

ट्रस्ट को संपत्ति दान करने पर स्टांप ड्यूटी कम की जा सकती है या छूट मिल सकती है। वहीं, गैर-

सरकारी संस्था को दान कर रहे हैं तो स्टांप ड्यूटी नहीं देनी पड़ेगी।

गवाह के रूप में साइन कौन कर सकता है?

- आपकी पहचान का वह हर व्यक्ति जो 18 वर्ष से अधिक आयु का हो।

हस्तांतरण दस्तावेज पंजीकृत न होने से क्या होगा?

- आप मुसीबत में फंस सकते हैं। इस तरह के दस्तावेजों का पंजीकरण होना अनिवार्य होता है। वर्ना 

कोर्ट-कचहरी के मामले में फंसने पर आप अपना हक होने का सबूत पेश नहीं कर पाएंगे।

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Jankari na dene par 200% tak income tax jurmana

गिफ्ट डीड के जरिये आप प्रॉपर्टी रिश्तेदारों को देकर टैक्स बचा सकते हैं। प्रॉपर्टी हस्तांतरण कर दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ, हानि से बच सकते हैं, लेकिन आपको कीमत के अनुसार स्टांप ड्यूटी तो चुकानी ही होगी।

इस अंतिम भाग में हम उपहार में दी जाने वाली संपत्ति के बारे में बता रहे हैं। यदि आपने कोई 

संपत्ति किसी को 'रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड' के जरिये दे दी है तो स्टांप ड्यूटी चुकाने और रजिस्ट्री के 

तुरंत बाद मालिकाना हक बदल जाएगा। फिर, मन बदलने पर आप इसे दोबारा हासिल नहीं कर 

पाएंगे।रजिस्ट्रेशन एक्ट 1908 के प्रावधानों के मुताबिक 'गिफ्ट डीड' सामने वाले पक्ष में कानूनन वैध 

मानी जाएगी। गिफ्ट संपत्ति तभी वापस ले सकते हैं, जब प्रॉपर्टी एक्ट 1982 सेक्शन 126 के 

मुताबिक अगर आप कॉन्ट्रैक्ट में यह साफ-साफ लिखते हैं कि आप चाहें तो संपत्ति वापस ले सकते 

हैं। एक जरूरी बात, आपको जमीन-जायदाद-प्लाट या कोई संपत्ति उपहार में कहीं से मिली है तो 

इसकी जानकारी आयकर भरते समय रिटर्न फॉर्म में देना जरूरी है। अगर जानकारी नहीं दी और 

आयकर जांच में यह बात समाने आती है तो आप पर संबंधित संपत्ति की कीमत से 200 फीसदी 

तक जुर्माना लग सकता है।

सामान्य तौर पर पूछे जाने वाले प्रश्न-उत्तर

कृषि भूमि हस्तांतरण पर क्या प्रतिबंध हैं?

राज्य के राजस्व कानूनों के अनुसार अनुसूचित जाति या जनजाति के लोगों को दी गई भूमि या 

अनुदान की भूमि राज्य सरकार की अनुमति बिना खरीदी नहीं जा सकती। ।

पॉवर ऑफ अटॉर्नी कब रद्द होती है? इससे संपत्ति मालिक बन सकते हैं क्या।

प्रथम पक्ष की मृत्यु पर रद्द हो जाती है। प्रिंसिपल (एक्जीक्यूटेंट/फर्स्ट पार्टी) किसी भी समय इसे रद्द 

कर सकता है। वहीं, पॉवर ऑफ अटॉर्नी से कोई संपत्ति का मालिक नहीं बन सकता। आप सिर्फ 

संपत्ति की देखभाल करने वाले होते हैं।

क्या पंजीयक पंजीकरण से मना कर सकता है?

हां। यदि रजिस्ट्री कराने वाले के पास खरीदी के पक्के प्रूफ न हों। पंजीकरण के चार महीने बीत 

चुकने पर दस्तावेज पेश किए गए हों। दस्तावेज नाबालिग द्वारा पेश किए हों। संपत्ति उप-जिले के 

भीतर स्थित न हो।

प्रॉपर्टी गिफ्ट पर टैक्स का हिसाब क्या होगा?

ऐसे मामलों में अगर वह शख्स आपका रिश्तेदार नहीं है तो उसे टैक्स चुकाना पड़ सकता है। टैक्स 

कानून के मुताबिक वित्त वर्ष में किसी को 50 हजार का गिफ्ट मिलता है तो उसे अन्य स्रोतों से 

प्रमुख आय के तहत टैक्स चुकाना पड़ेगा। 

गिफ्ट डीड पर टैक्स : आपको पता होना चाहिए कि सभी उपहार करमुक्त नहीं होते हैं। पुराने 

कानून को रद्द कर फाइनेंस एक्ट 2004 में सेक्शन 56 (2) (v) जोड़कर गिफ्ट पर टैक्स वसूलना 

लागू किया गया है। नकद मिले या कोई संपत्ति, एक वित्त वर्ष में 50 हजार रुपए तक ही टैक्स फ्री है।


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  Police F.I.R : Jane police F.I.R likhne se mana kare toh kya kare                                                                             
 
 

 

 

 







Jane police F.I.R likhne se mana kare toh kya kare

 

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 रिपोर्ट मौखिक और ऑनलाइन भी दर्ज होती है 

  दर्ज रिपोर्ट इस आधार पर रद्द भी हो सकती है, यदि हाईकोर्ट    को लगे कि मामला झूठा है और 

व्यक्ति निर्दोष है। उसे गलत तरीके से फंसाया गया है। पीडित गिरफ्तार है तो उसे मुक्त करने का

आदेश दिया जाता है।

 फआईआर के इस भाग में हम आपको बता रहे हैं कि शिकायत कितने तरीके से दर्ज कराई जा 

सकती है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि अपराध किस श्रेणी का है और शिकायतकर्ता पुलिस 

की पहुंच से कितना दूर है? गंभीर अपराध की रिपोर्ट मौखिक या फोन पर दर्ज कराने के बाद उसे 

लिखित में भी दर्ज करानी होती है। कानून तो यह है कि कोई भी पीड़ित व्यक्ति किसी भी माध्यम 

से पुलिस को शिकायत करे, पुलिस का काम उसे गंभीरता से दर्ज कर उचित कार्रवाई करना होता है। 

दर्ज रिपोर्ट पर कुछ ही घंटों बाद संज्ञान लेना पुलिस के लिए जरूरी है।

मौखिक शिकायत : परेशान करने, धमकाने या अपने मजे के लिए दूसरे को तकलीफ पहुंचाने जैसे 

अनेक मामलों में पुलिस को मौखिक शिकायत की जा सकती है। फिर पुलिस आरोपी को मौखिक रूप 

से धमकाती है कि अगली बार शिकायत आई तो बाकायदा रिपोर्ट दर्ज कर कार्रवाई की जाएगी।

टेलिफोन पर शिकायत : दुर्घटना, छेड़खानी, हुड़दंग करने वालों के खिलाफ या आपने कोई क्राइम होते 

देखा है और आप पुलिस के सामने आना नहीं चाहते हैं। वैसी स्थिति में सार्वजनिक फोन से पुलिस 

को सूचना देकर फर्ज निभा सकते हैं। वैसे आप पुलिस तक पहुंचने की स्थिति में नहीं हैं तो हर तरह 

के मामले की शिकायत फोन पर की जा सकती है। 

ऑनलाइन अथवा टेलिग्राम के जरिये : कई राज्यों ने यह व्यवस्था लागू कर दी है कि पीड़ित व्यक्ति 

हर तरह के मामले की शिकायत पुलिस के पोर्टल पर ऑनलाइन दर्ज करा सकते हैं।इसके लिए आपको 

अपना ई-मेल तथा फोन नंबर विशेष रूप से दर्ज कराना होता है।शिकायत दर्ज होने के 24 घंटे के 

भीतर पुलिसआपको फोन पर संपर्क करेगी। इसके अलावा, आप टेलिग्राम से भी शिकायत दर्ज करा 

सकते हैं। कानून के अनुसार इस तरह की जानकारी एफआईआर नहीं है, क्योंकि इसमें प्रामाणिकता

का अभाव है और शिकायतकर्ता के साइन करना संभव नहीं।

 झूठी एफआईआर अपराध है

झूठी एफआईआर या शिकायत दर्ज करना आईपीसी के तहत दंडनीय अपराध है। ऐसे शिकायतकर्ता के 

खिलाफ आईपीसी की धारा 182 के तहत या पुलिस द्वारा धारा 211 के तहत कार्रवाई की जा सकती 

है। जिस व्यक्ति के खिलाफ झूठी एफआईआर दर्ज कराई गई है, वह भी मानहानि के अपराध के लिए 

आपके खिलाफ अदालत में शिकायत दर्ज कर सकता है।

कंप्लेंट पिटीशन दायर करने का अधिकार है आपके पास 

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एफआईआर लिखवाना आपका अधिकार है।आपकी रिपोर्ट नहीं लिखने वाले अधिकारी पर कोर्ट कार्रवाई 

के आदेश दे सकता है। कुछ परिस्थितियों में उस अधिकारी को सस्पेंड किया जा सकता है, जेल भी 

हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि किसी भी व्यक्ति की एफआईआर दर्ज करने से पुलिस मना नहीं करेगी। 

एफआईआर दर्ज करने से मना करने वाले पुलिस अधिकारी तथा उस थाने के इंस्पेक्टर के खिलाफ 

कार्रवाई का आदेश भी सुप्रीम कोर्ट ने दिया हुआ है। 'सच्चाई पर संदेह' का बहाना बनाकर कोई पुलिस 

अधिकारी एफआईआर दर्ज करने से मना नहीं कर सकता। अगर अपकी रिपोर्ट लिखी नहीं जाए तो 

अपने क्षेत्र के मजिस्ट्रेट के सामने आप पुलिस को दिशा-निर्देश के लिए कंप्लेंट पिटीशन' दायर कर 

सकते हैं कि 24 घंटे के भीतर आपकी एफआईआर दर्ज कर आपको उसकी कॉपी उपलब्ध कराई जाए। 

मजिस्ट्रेट के आदेश का पालन नहीं करने पर उस पुलिस अधिकारी पर सीधे कार्रवाई होगी, उसे जेल 

भी हो सकती है। दूसरा रास्ता यह है कि अपनी शिकायत रजिस्टर्ड डाक से पुलिस के वरिष्ठ अफसरों 

को भेजें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अग्रिम जमानत कौन दायर कर सकता है?

- कोई भी व्यक्ति जिसे संदेह हो कि उसे गैर जमानती अपराध के लिए गिरफ्तार किया जा सकता है, 

वह अग्रिम जमानत की मांग करने वाली याचिका दायर कर सकता है।

• अंतरिम जमानत क्या है?

- यह अस्थायी जमानत होती है। इसका मतलब है, उस व्यक्ति को तब तक गिरफ्तार न किया जाए 

जब तक कि कोर्ट अग्रिम जमानत याचिका पर गिरफ्तारी आदेश पारित नहीं कर देता। यानी अंतरिम 

जमानत का जीवन तभी तक है जब तक अग्रिम जमानत देने या खारिज करने वाले आदेश को 

अदालत पारित नहीं करती।

• अग्रिम जमानत बाद भी पुलिस जांच के लिए बुला सकती है?

- हां बेशक। यह जमानत केवल गिरफ्तारी पर, रोक लगाती है, लेकिन जांच के लिए थाने बुलाने से 

नहीं रोकती।यह अग्रिम जमानत की शतों में शामिल है।ऐसा करने से इनकार करने पर जांच अधिकारी 

को अग्रिम जमानत रद्द करने के लिए कोर्ट को कह सकता है। यदि जांच अधिकारी यह पाता है कि 

अदालत द्वारा किसी अभियुक्त की अग्रिम जमानत के खिलाफ आपराधिक मामला बनाया गया है,तो 

वह उसे गिरफ्तार नहीं करेगा, लेकिन उसे जमानत पर छोड़ देगा, भले ही वह अपराध गैर-जमानती हो।

एफआईआर-चार्जशीट में क्या अंतर है?

- किसी अपराध के लिए दर्ज की गई रिपोर्ट एफआईआर कहलाती है। रिपोर्ट के आधार पर की गई 

जांच में यदि पुलिस मानती है कि उसके पास अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं तो 

आरोपी के खिलाफ आरोप-पत्र यानी चार्जशीट बनाई जाती है। इसी चार्जशीट को कोर्ट में दाखिल कर

मुकदमा आगे चलता है।

जमानत से पहले क्रिमिनल रिकॉर्ड भी देखता है जज 

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संज्ञेय अपराध में पलिस अफसर किसी व्यक्ति को शक की बिना पर बगैर वारंट गिरफ्तार कर सकता 

है। यह गिरफ्तारी पूछताछ के लिए होती है। इस दौरान शारीरिक चोट पहुंचाने की मनाही है। ऐसा

होता है तो कोर्ट में शिकायत करें।

धोखा, चीटिंग, बेईमानी से किसी की मूल्यवान संपत्ति हड़पना, बैंक को धोखा देना जैसे अनेक मामले 

चार सौ बीसी के अंतर्गत आते हैं। ऐसे मामलों में पुलिस पहले जांच-पड़ताल करती है, उसके बाद 

एफआईआर दर्ज की जाती है। अपराध सिद्ध होने और अपराध की गंभीरता के अनुसार आरोपी को 7 

वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का प्रावधान है। आरोपी को जमानत दी जाए या नहीं, यह मामले की

गंभीरता पर निर्भर करता है। ऐसे मामलों में 60 से 90 दिन में पुलिस को चार्जशीट दाखिल करनी 

होती है। 420 में गिरफ्तार व्यक्ति अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकता है। जमानत का 

निर्णय करने से पहले न्यायाधीश आरोपी का क्रिमिनल रिकॉर्ड भी देखते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

• पुलिस खात्मा किसे कहा जाता है?

- किसी मामले की जांच के बाद पुलिस को लगता है कि कोर्ट में इसे अपराध साबित करने वाले 

सबूत पूरे नहीं हैं, तो ऐसे मामले की फाइल पुलिस बंद कर देती है। किसी मामले की जांच बंद करना 

ही खात्मा कहा जाता है।

• जमानती और गैर जमानती अपराध में क्या अंतर है?

- जमानती अपराध वे कहलाते हैं जिसमें आरोपी को थाने से ही जमानत मिल जाती है। इसमें छोटी-

मोटी चोरी, मारपीट, घरेलू झगड़े, संपत्ति के छोटे विवाद, धमकी देना आदि आते हैं। गैर जमानती 

अपराध में कोर्ट से ही जमानत मिलती है या नहीं भी मिलती है। गैरजमानती अपराध में सभी तरह 

के गंभीर अपराध शामिल होते हैं।

• सरकारी दफ्तरों के भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी की रिपोर्ट कहां करें?

- इनकी रिपोर्ट सेंट्रल विजिलेंस कमीशन (सीवीसी)' से कर सकते हैं। इसके अंतर्गत केंद्र सरकार के 

मंत्रालय/विभाग, केंद्र सरकार के सभी पीएसयू, नेशनलाइज्ड बैंक, रिजर्व बैंक, नाबार्ड और सिडबी, 

सरकारी बीमा कंपनियां, पोर्ट ट्रस्ट व डॉक लेबर बोर्ड आदि आते हैं। सीवीसी को सीधे पत्र लिखकर या 

वेबसाइट www.cvc.nic.in पर भी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। यह जरूर जांच लें कि जिसके 

खिलाफ शिकायत करनी है, वह सीवीसी के अधिकार क्षेत्र में आता हो।

मेरे खिलाफ झूठी FIR हुई, क्या करूं?

- आपके खिलाफ सामने वाले ने झूठी रिपोर्ट दर्ज कराई है तो आप भी उसके खिलाफ पुलिस में 

शिकायत कर दें। जरूरी नहीं कि आपकी एफआईआर रजिस्टर्ड हो, लेकिन यह कोर्ट में आपका बचाव 

करेगी। इसी शिकायत के आधार पर आप सामने वाले के खिलाफ कोर्ट भी जा सकते हैं। अपने 

खिलाफ की गई शिकायत के विरुद्ध आप बड़े अफसरों को भी लिखें, ताकि वे कोर्ट बहस में कह सकें  

कि आपने पुलिस को सच्चाई बताई थी।


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