रिपोर्ट मौखिक और ऑनलाइन भी दर्ज होती है
दर्ज रिपोर्ट इस आधार पर रद्द भी हो सकती है, यदि हाईकोर्ट को लगे कि मामला झूठा है और
व्यक्ति निर्दोष है। उसे गलत तरीके से फंसाया गया है। पीडित गिरफ्तार है तो उसे मुक्त करने का
आदेश दिया जाता है।
एफआईआर के इस भाग में हम आपको बता रहे हैं कि शिकायत कितने तरीके से दर्ज कराई जा
सकती है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि अपराध किस श्रेणी का है और शिकायतकर्ता पुलिस
की पहुंच से कितना दूर है? गंभीर अपराध की रिपोर्ट मौखिक या फोन पर दर्ज कराने के बाद उसे
लिखित में भी दर्ज करानी होती है। कानून तो यह है कि कोई भी पीड़ित व्यक्ति किसी भी माध्यम
से पुलिस को शिकायत करे, पुलिस का काम उसे गंभीरता से दर्ज कर उचित कार्रवाई करना होता है।
दर्ज रिपोर्ट पर कुछ ही घंटों बाद संज्ञान लेना पुलिस के लिए जरूरी है।
मौखिक शिकायत : परेशान करने, धमकाने या अपने मजे के लिए दूसरे को तकलीफ पहुंचाने जैसे
अनेक मामलों में पुलिस को मौखिक शिकायत की जा सकती है। फिर पुलिस आरोपी को मौखिक रूप
से धमकाती है कि अगली बार शिकायत आई तो बाकायदा रिपोर्ट दर्ज कर कार्रवाई की जाएगी।
टेलिफोन पर शिकायत : दुर्घटना, छेड़खानी, हुड़दंग करने वालों के खिलाफ या आपने कोई क्राइम होते
देखा है और आप पुलिस के सामने आना नहीं चाहते हैं। वैसी स्थिति में सार्वजनिक फोन से पुलिस
को सूचना देकर फर्ज निभा सकते हैं। वैसे आप पुलिस तक पहुंचने की स्थिति में नहीं हैं तो हर तरह
के मामले की शिकायत फोन पर की जा सकती है।
ऑनलाइन अथवा टेलिग्राम के जरिये : कई राज्यों ने यह व्यवस्था लागू कर दी है कि पीड़ित व्यक्ति
हर तरह के मामले की शिकायत पुलिस के पोर्टल पर ऑनलाइन दर्ज करा सकते हैं।इसके लिए आपको
अपना ई-मेल तथा फोन नंबर विशेष रूप से दर्ज कराना होता है।शिकायत दर्ज होने के 24 घंटे के
भीतर पुलिसआपको फोन पर संपर्क करेगी। इसके अलावा, आप टेलिग्राम से भी शिकायत दर्ज करा
सकते हैं। कानून के अनुसार इस तरह की जानकारी एफआईआर नहीं है, क्योंकि इसमें प्रामाणिकता
का अभाव है और शिकायतकर्ता के साइन करना संभव नहीं।
झूठी एफआईआर अपराध है
झूठी एफआईआर या शिकायत दर्ज करना आईपीसी के तहत दंडनीय अपराध है। ऐसे शिकायतकर्ता के
खिलाफ आईपीसी की धारा 182 के तहत या पुलिस द्वारा धारा 211 के तहत कार्रवाई की जा सकती
है। जिस व्यक्ति के खिलाफ झूठी एफआईआर दर्ज कराई गई है, वह भी मानहानि के अपराध के लिए
आपके खिलाफ अदालत में शिकायत दर्ज कर सकता है।
कंप्लेंट पिटीशन दायर करने का अधिकार है आपके पास
एफआईआर लिखवाना आपका अधिकार है।आपकी रिपोर्ट नहीं लिखने वाले अधिकारी पर कोर्ट कार्रवाई
के आदेश दे सकता है। कुछ परिस्थितियों में उस अधिकारी को सस्पेंड किया जा सकता है, जेल भी
हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि किसी भी व्यक्ति की एफआईआर दर्ज करने से पुलिस मना नहीं करेगी।
एफआईआर दर्ज करने से मना करने वाले पुलिस अधिकारी तथा उस थाने के इंस्पेक्टर के खिलाफ
कार्रवाई का आदेश भी सुप्रीम कोर्ट ने दिया हुआ है। 'सच्चाई पर संदेह' का बहाना बनाकर कोई पुलिस
अधिकारी एफआईआर दर्ज करने से मना नहीं कर सकता। अगर अपकी रिपोर्ट लिखी नहीं जाए तो
अपने क्षेत्र के मजिस्ट्रेट के सामने आप पुलिस को दिशा-निर्देश के लिए कंप्लेंट पिटीशन' दायर कर
सकते हैं कि 24 घंटे के भीतर आपकी एफआईआर दर्ज कर आपको उसकी कॉपी उपलब्ध कराई जाए।
मजिस्ट्रेट के आदेश का पालन नहीं करने पर उस पुलिस अधिकारी पर सीधे कार्रवाई होगी, उसे जेल
भी हो सकती है। दूसरा रास्ता यह है कि अपनी शिकायत रजिस्टर्ड डाक से पुलिस के वरिष्ठ अफसरों
को भेजें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
• अग्रिम जमानत कौन दायर कर सकता है?
- कोई भी व्यक्ति जिसे संदेह हो कि उसे गैर जमानती अपराध के लिए गिरफ्तार किया जा सकता है,
वह अग्रिम जमानत की मांग करने वाली याचिका दायर कर सकता है।
• अंतरिम जमानत क्या है?
- यह अस्थायी जमानत होती है। इसका मतलब है, उस व्यक्ति को तब तक गिरफ्तार न किया जाए
जब तक कि कोर्ट अग्रिम जमानत याचिका पर गिरफ्तारी आदेश पारित नहीं कर देता। यानी अंतरिम
जमानत का जीवन तभी तक है जब तक अग्रिम जमानत देने या खारिज करने वाले आदेश को
अदालत पारित नहीं करती।
• अग्रिम जमानत बाद भी पुलिस जांच के लिए बुला सकती है?
- हां बेशक। यह जमानत केवल गिरफ्तारी पर, रोक लगाती है, लेकिन जांच के लिए थाने बुलाने से
नहीं रोकती।यह अग्रिम जमानत की शतों में शामिल है।ऐसा करने से इनकार करने पर जांच अधिकारी
को अग्रिम जमानत रद्द करने के लिए कोर्ट को कह सकता है। यदि जांच अधिकारी यह पाता है कि
अदालत द्वारा किसी अभियुक्त की अग्रिम जमानत के खिलाफ आपराधिक मामला बनाया गया है,तो
वह उसे गिरफ्तार नहीं करेगा, लेकिन उसे जमानत पर छोड़ देगा, भले ही वह अपराध गैर-जमानती हो।
• एफआईआर-चार्जशीट में क्या अंतर है?
- किसी अपराध के लिए दर्ज की गई रिपोर्ट एफआईआर कहलाती है। रिपोर्ट के आधार पर की गई
जांच में यदि पुलिस मानती है कि उसके पास अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं तो
आरोपी के खिलाफ आरोप-पत्र यानी चार्जशीट बनाई जाती है। इसी चार्जशीट को कोर्ट में दाखिल कर
मुकदमा आगे चलता है।
जमानत से पहले क्रिमिनल रिकॉर्ड भी देखता है जज
संज्ञेय अपराध में पलिस अफसर किसी व्यक्ति को शक की बिना पर बगैर वारंट गिरफ्तार कर सकता
है। यह गिरफ्तारी पूछताछ के लिए होती है। इस दौरान शारीरिक चोट पहुंचाने की मनाही है। ऐसा
होता है तो कोर्ट में शिकायत करें।
धोखा, चीटिंग, बेईमानी से किसी की मूल्यवान संपत्ति हड़पना, बैंक को धोखा देना जैसे अनेक मामले
चार सौ बीसी के अंतर्गत आते हैं। ऐसे मामलों में पुलिस पहले जांच-पड़ताल करती है, उसके बाद
एफआईआर दर्ज की जाती है। अपराध सिद्ध होने और अपराध की गंभीरता के अनुसार आरोपी को 7
वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का प्रावधान है। आरोपी को जमानत दी जाए या नहीं, यह मामले की
गंभीरता पर निर्भर करता है। ऐसे मामलों में 60 से 90 दिन में पुलिस को चार्जशीट दाखिल करनी
होती है। 420 में गिरफ्तार व्यक्ति अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकता है। जमानत का
निर्णय करने से पहले न्यायाधीश आरोपी का क्रिमिनल रिकॉर्ड भी देखते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
• पुलिस खात्मा किसे कहा जाता है?
- किसी मामले की जांच के बाद पुलिस को लगता है कि कोर्ट में इसे अपराध साबित करने वाले
सबूत पूरे नहीं हैं, तो ऐसे मामले की फाइल पुलिस बंद कर देती है। किसी मामले की जांच बंद करना
ही खात्मा कहा जाता है।
• जमानती और गैर जमानती अपराध में क्या अंतर है?
- जमानती अपराध वे कहलाते हैं जिसमें आरोपी को थाने से ही जमानत मिल जाती है। इसमें छोटी-
मोटी चोरी, मारपीट, घरेलू झगड़े, संपत्ति के छोटे विवाद, धमकी देना आदि आते हैं। गैर जमानती
अपराध में कोर्ट से ही जमानत मिलती है या नहीं भी मिलती है। गैरजमानती अपराध में सभी तरह
के गंभीर अपराध शामिल होते हैं।
• सरकारी दफ्तरों के भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी की रिपोर्ट कहां करें?
- इनकी रिपोर्ट सेंट्रल विजिलेंस कमीशन (सीवीसी)' से कर सकते हैं। इसके अंतर्गत केंद्र सरकार के
मंत्रालय/विभाग, केंद्र सरकार के सभी पीएसयू, नेशनलाइज्ड बैंक, रिजर्व बैंक, नाबार्ड और सिडबी,
सरकारी बीमा कंपनियां, पोर्ट ट्रस्ट व डॉक लेबर बोर्ड आदि आते हैं। सीवीसी को सीधे पत्र लिखकर या
वेबसाइट www.cvc.nic.in पर भी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। यह जरूर जांच लें कि जिसके
खिलाफ शिकायत करनी है, वह सीवीसी के अधिकार क्षेत्र में आता हो।
• मेरे खिलाफ झूठी FIR हुई, क्या करूं?
- आपके खिलाफ सामने वाले ने झूठी रिपोर्ट दर्ज कराई है तो आप भी उसके खिलाफ पुलिस में
शिकायत कर दें। जरूरी नहीं कि आपकी एफआईआर रजिस्टर्ड हो, लेकिन यह कोर्ट में आपका बचाव
करेगी। इसी शिकायत के आधार पर आप सामने वाले के खिलाफ कोर्ट भी जा सकते हैं। अपने
खिलाफ की गई शिकायत के विरुद्ध आप बड़े अफसरों को भी लिखें, ताकि वे कोर्ट बहस में कह सकें
कि आपने पुलिस को सच्चाई बताई थी।
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