भगवान भी खेलते थे खेल, बौद्धिकता के फेर में हमने यह बात भुला दी : MYTHOLOGY
माना जाता है कि आज का शतरंज इसी चतुरंग से विकसित हुआ था।
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हर चार साल में जब ओलिम्पिक खेले है जाते हैं, तब भारत में क्रिकेट की धुन थोड़ी कम हो जाती है और सभी
लोग यह चर्चा करने लगते हैं कि हम कितने ओलिम्पिक पदक जीतेंगे। दुर्भाग्यवश, जितने पदक अपेक्षित हैं,
उससे बहुत कम पदक हम जीत पाते हैं।
ओलिम्पिक खेलों का आधुनिक रूप प्राचीन ग्रीस में खेले गए खेलों पर
आधारित है। वहां खेल मृत नायकों और नेताओं के सम्मान में किए गए अंतिम संस्कार का हिस्सा थे। भारत में
भी प्राचीन काल से खेल खेले जाते रहे हैं। हड़प्पा में मिली मुहरों से पता चलता है कि वे लोग सांड से लड़ाई करने
या उस पर छलांग मारने के खेलों से परिचित थे, जो कृषि समुदायों में आम तौर पर खेले जाते थे। ये लगभग
तमिलनाडु के जल्लीकट्टू की तरह के थे। वेदों में रथ की दौड़ और जुआ खेल के रूप में उल्लेखित हैं। रामायण और
महाभारत में योद्धा राजकुमार धनुर्विद्या, गदा युद्ध, तलवारबाजी, कुश्ती और अन्य सैन्य खेलों में कुशल थे। इस
प्रकार हम दावे से कह सकते हैं कि भारत में खेल कृषि समुदायों के साथ-साथ सैनिक समुदायों दोनों में शुरू हुए।
प्रारंभिक बौद्ध काल में हमें सूर्यदेव के ऐसे चित्र मिलते हैं जिनमें वे रथ पर महिला धनुर्धरों
से घिरे हैं। ये चित्र दर्शाते हैं कि पुरुषों की तरह महिलाएं भी धनुर्विद्या का आनंद लेती थीं और अक्सर शिकार
करने जाती थीं। महाभारत में रेणुका का उल्लेख है, जो इतनी तेज़ दौड़ सकती थी कि वह अपने पति के तीर को
लक्ष्य पर लगने से पहले ही पकड़ सकती थी। तमिल लोक महाभारत में शेर या हिरण के पैरों वाला पुरुष-मृग
नामक प्राणी भीम को दौड़ के लिए चुनौती देता है। इसके अलावा लोककथाओं के अनुसार जिन प्रतिस्पर्धी खेलों
में डंडे (गिल्ली-डंडा), शरीर (कबड्डी), गेंद (लगोरी) और रस्सी (रस्सा- कस्सी) का इस्तेमाल होता है, उनका
आविष्कार शाश्वत प्रतिद्वंद्वियों पांडवों और कौरवों ने किया।
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भारत को तख्त के खेलों की भूमि माना जाता है। लोगों को कर्म की धारणा सिखाने के लिए जैन मुनियों ने
सांप-सीढ़ी जैसे खेलों का आविष्कार किया था। गंजीफा पत्ते भारतीय राजाओं और रानियों में लोकप्रिय थे।
मंदिरों के फर्श पर हम लूडो और चतुरंग जैसे विभिन्न खेलों की नक्काशी पाते हैं। बाद में इन खेलों ने आधुनिक
काल के शतरंज के खेल को जन्म दिया। पौराणिक कथाओं में विष्णु और लक्ष्मी की तरह शिव और पार्वती भी
पासों से खेलते हैं। इसलिए तख्त के खेल और पत्ते खेलना अनुष्ठानों का एक लोकप्रिय हिस्सा है, विशेषकर
दिवाली के दौरान।
मंदिरों में कुश्ती के दृश्य उकेरे गए हैं। कृष्ण को कुश्ती प्रिय थी, लेकिन राम को नहीं थी। इस प्रकार
विष्णु के दो अवतारों में अंतर दर्शाया गया है- साधारण परिवार और शाही परिवार में जन्म लेने वाले अवतार।
भीम और दुर्योधन पानी में तैरने और लंबे समय तक पानी के नीचे सांस रोककर रखने के लिए प्रसिद्ध थे।
केरल में मोहिनिअट्टम नृत्य के एक भाग में महिलाएं समुद्र तट पर गेंदों से खेलती हैं। क्या वे केवल गेंदों
को आपस में फेंक रही हैं या वालीबॉल जैसा खेल खेल रही हैं? हम केवल अनुमान लगा सकते हैं। ठीक उसी तरह
यह केवल हमारा अनुमान होगा कि क्या रावण का कैलाश पर्वत या कृष्ण का गोवर्धन उठाना वेट-लिफ़्टिंग के
लिए और हनुमान का समुद्र के पार कूदना लॉन्ग-जंप का रूपक है या नहीं।
लगभग 2,000 साल पहले मणिपुर में पोलो खेला जाता था। उसे सागोल (घोड़ों) पर बैठकर खेला गया
कांगजी (हॉकी) कहा जाता था। तुर्की सरदार और मुग़ल सैनिक उसे भारत लाए थे। वे गेंद की जगह मृत भेड़ों का
इस्तेमाल करते थे और कभी-कभार घोड़ों के बजाय हाथियों पर सवार होते थे। एक किंवदंती के अनुसार लगभग
1,500 साल पहले मार्शल आर्ट को बोधिधर्म केरल से चीन के शाओलिन मंदिर ले गए थे।
भारत के बौद्धिक इतिहास के कारण खेल से संबंधित इस इतिहास को लोग भूल चुके हैं। ऐसा शायद
इसलिए है कि हम मन को अधिक महत्व देते हैं। क्या ओलिम्पिक खेलों में हमारे बुरे प्रदर्शन की एक वजह यह भी
हो सकती है?

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